भतीजे ने चाची की टाइट चूत चोद कर अंदर माल भरा - चाची की चीखें निकली

एक दिन जब पूरा घर खाली हुआ, राहुल ने चाची को सोफे पर लिटाकर उनकी टाइट चूत में अपना मोटा लंड घुसा दिया। पहले दर्द से चीखी, फिर मज़े से चुदवाने लगी। उस दिन के बाद तो जैसे दोनों को एक-दूसरे की ज़रूरत लग गई।

लेखक: Sujit Rajgor6 मिनट पढ़ने में
भतीजे ने चाची की टाइट चूत चोद कर अंदर माल भरा - चाची की चीखें निकली

मेरा नाम राहुल है। हम लोग दिल्ली में जॉइंट फैमिली में रहते हैं। घर बड़ा है, सब मिल-जुलकर रहते हैं।

मेरे छोटे चाचा गाँव में रहते थे। उनकी शादी भी गाँव में ही हुई थी लगभग छह महीने पहले। शादी में मैं और मेरे मम्मी-पापा भी गए थे। दुल्हन गाँव की एकदम साधारण घर की लड़की थी। शादी के बाद चाचा अपनी नई बीवी को लेकर गाँव में ही रहने लगे।

अब छह महीने बाद चाचा-चाची दिल्ली आए। किसी रिश्तेदार के यहाँ कोई फंक्शन था। इसलिए वे दस-बारह दिनों के लिए दिल्ली रुके हुए थे। हमारे घर पर ही ठहरे थे।

जब वे आए तो पहली बार चाची को पास से देखा। गाँव की वह औरत लग ही नहीं रही थी। गोरी-चिट्टी चमकदार त्वचा, उम्र करीब पच्चीस-छब्बीस की, बिल्कुल जवान और तरोताजा। साड़ी में बंधी पतली और कर्वी कमर। ऊपर गोल-मटोल, थोड़े बड़े और ठोस स्तन ब्लाउज़ में कसकर भरे हुए। हर साँस के साथ वे हल्के-हल्के उठते-गिरते दिखते। नीचे थोड़ी फैली हुई मुलायम और लटकती गांड साड़ी के पल्लू के नीचे अपना गोल आकार दिखा रही थी। चलते समय वह गांड थोड़ी-थोड़ी हिलती थी। चेहरे पर हल्की मीठी मुस्कान, आँखों में शरारत और बोलने का अंदाज़ इतना प्यारा कि दिल धड़कने लगता।

“अरे राहुल बेटा, कितना बड़ा हो गया तू!” वह पास आईं और गले मिल गईं। उनके नरम स्तन मेरे सीने से सट गए। गर्माहट और खुशबू दोनों एक साथ महसूस हुई। मैंने बाँहों में कस लिया। हाथ उनकी कमर पर फिसल गए, फिर थोड़ा नीचे जाकर गांड की गोलाई को हल्का सा दबाया। वह कुछ नहीं बोलीं, बस हल्की सी मुस्कुराईं और आँखें झुका लीं।

उस दिन से ही बातें बढ़ने लगीं। चाची घर के कामों में रहतीं, पर जब भी मौका मिलता मेरे पास आ जातीं। मैं मीठी-मीठी बातें करता—उनकी सुंदरता की तारीफ, गाँव की यादें, दिल्ली की जिंदगी। बीच-बीच में हाथ फिसल जाता। कभी बाँह पर, कभी कमर पर, कभी साड़ी के ऊपर से ही स्तनों के उभार पर हल्का स्पर्श। वह जानती थीं। नज़रें मिलातीं तो शर्म से झुक जातीं, पर हटती नहीं थीं। कभी-कभी जानबूझकर पास खड़ी हो जातीं ताकि मेरा हाथ उनकी गांड या स्तनों से रगड़ खाए।

फिर वह दिन आया। घर के सब लोग शॉपिंग के लिए निकल गए। पाँच-छह घंटे का समय था। चाचा भी साथ गए। घर में सिर्फ मैं और चाची रह गए।

दरवाज़ा बंद होते ही माहौल बदल गया। चाची सोफे पर बैठी थीं। साड़ी का पल्लू थोड़ा ढीला था। गोरी गर्दन और स्तनों का उभार साफ चमक रहा था। मैं पास जाकर बैठ गया।

“चाची, आप इतनी सुंदर लग रही हो,” मैंने धीरे से कहा। वह मुस्कुराईं, “अरे बेटा, ऐसी बातें मत कर।” मैंने उनका हाथ पकड़ लिया। “सच बोल रहा हूँ। गाँव से आई हो और लगती हो जैसे कोई नई जवान लड़की।”

मेरा हाथ उनकी जाँघ पर रख दिया। साड़ी के ऊपर से मुलायम मांस दबाया। वह सहम गईं, पर हटीं नहीं। मैं और पास खिसका। हाथ साड़ी के अंदर घुसाया। जाँघ की गर्माहट महसूस हुई। फिर ऊपर बढ़कर ब्लाउज़ के ऊपर से स्तन दबाए। नरम, भारी और गोल। निप्पल सख्त हो चुके थे।

“चाची… चाचा आपको खुश नहीं कर पाते ना?” मैंने फुसफुसाया। वह शर्म से आँखें झुका लीं। “नहीं बेटा… उनका… छोटा है। मुझे… लंबा चाहिए। मेरी बॉडी तड़पती रहती है।”

मेरा लंड पूरी तरह तन चुका था। मैंने पेंट का जिप खोला और बाहर निकाल लिया। लंबा, मोटा और नसों से भरा। चाची की आँखें फटी रह गईं।

“इतना बड़ा…” वह बोलीं। “चाची, मेरी पहली बार है,” मैंने सच बता दिया। “कभी किसी के साथ नहीं किया। आप ही सिखाओ। अपना मुँह लगाओ पहले।”

वह झिझकीं, फिर झुक गईं। गर्म होंठों से मेरे लंड को छुआ। जीभ निकाली और चाटने लगीं। फिर पूरा मुँह में ले लिया। गले तक धकेलने की कोशिश की। थूक टपक रहा था। मैंने उनके बाल पकड़ लिए और धीरे-धीरे आगे-पीछे करने लगा।

“आह चाची… बहुत अच्छा चूस रही हो… और गहरा लो…”

थोड़ी देर बाद मैंने लंड बाहर निकाला। वह साँस ले रही थीं। मैंने उन्हें सोफे पर लिटा दिया। साड़ी और ब्लाउज़ खोल दिए। गोरे गोल स्तन बाहर आ गए। निप्पल गुलाबी और कड़े। मैंने मुँह लगाकर चूसना शुरू किया। एक-एक करके दोनों स्तन चाटे, चूसे, हल्के से काटे। वह कराह उठीं।

फिर पेटीकोट और पैंटी सरका दी। उनकी चूत गीली थी। बाल थोड़े से, चिकनी और गर्म। मैंने लंड उनकी चूत के पास लाया। सिरे से रगड़ा।

“चाची, पहली बार है मेरी। आप सिखाओ कैसे डालूँ। अंदर लो।”

उन्होंने खुद अपने दोनों हाथों से अपनी चूत के होंठ खोले और बोलीं, “आहस्ता से डालो बेटा… धीरे…”

मैंने लंड का सिरा अंदर लगाया और धीरे-धीरे धकेला। पूरा अंदर चला गया। उनकी चूत ने कस लिया। इतनी गर्म और गीली थी कि मैं पागल हो गया।

“आह्ह्ह… पूरा अंदर है चाची…” “अब हिलाओ बेटा… जोर से चोदो मुझे…”

मैंने हिलाना शुरू किया। पहले धीरे, फिर जोर-जोर से। सोफा चरमरा रहा था। उनके स्तन हर धक्के पर हिल रहे थे। मैंने स्तन चूसते हुए और तेज़ कर दिया।

“चाची की चूत कितनी टाइट है… चाचा ने कभी इतनी जोर से चोदा क्या?” “नहीं… कभी नहीं… और जोर से… फाड़ दो मेरी चूत…”

मैंने उन्हें उठाया और बेडरूम के बिस्तर पर ले गया। वहाँ उन्हें चारों खाने चित लिटाया। टाँगें फैलाईं और फिर से पूरा लंड अंदर घुसा दिया। अब पूरी ताकत से चोदने लगा। बिस्तर चरमरा रहा था। उनकी गांड थपथपा रही थी हर धक्के पर।

फिर मैंने उन्हें पेट के बल लिटाया। गांड ऊपर उठाई। पहले चूत में फिर से डाला, फिर थूक लगाकर गांड के छेद में धीरे-धीरे घुसाया। वह दर्द से कराह रही थीं, पर पीछे की तरफ धकेल रही थीं।

“दोनों छेद फाड़ दो बेटा… माल भर दो अंदर…” “चाची… आपकी गांड भी कितनी नरम है… अब आदत डाल दूँगा रोज चोदने की…”

पाँच-छह घंटे ऐसे ही बीते। सोफे से बिस्तर तक। कभी ऊपर से, कभी पीछे से, कभी उन्हें अपने ऊपर बिठाकर। वह मेरे लंड पर बैठकर खुद हिल रही थीं। स्तन मेरे मुँह में ठूंस रही थीं। मैं उनके दोनों छेदों में बार-बार झड़ता रहा। आखिर में पूरा गाढ़ा माल उनकी चूत और गांड दोनों में भर दिया।

वह थककर बिस्तर पर गिर गईं। पसीने से तर, बाल बिखरे, साँसें तेज़। चलने में तकलीफ हो रही थी। मैंने उन्हें चूमते हुए कहा, “धीरे-धीरे आदत हो जाएगी चाची। जब भी मौका मिलेगा, फिर से करेंगे। वादा है ना?”

उन्होंने आँखों में पानी लिए सिर हिलाया और मुस्कुरा दीं।

बाहर गाड़ियों की आवाज़ आने लगी। सब लौट रहे थे। हमने जल्दी कपड़े पहन लिए। वह चलते-चलते थोड़ी लंगड़ा रही थीं, पर चेहरा सामान्य बना लिया।

दरवाज़ा खुला। सब अंदर आए। हम दोनों वैसे ही बैठे थे जैसे कुछ हुआ ही न हो। पर मेरे और उनके बीच का राज़ अब घर की दीवारों में कैद हो चुका था।

उस दिन के बाद घर में सब कुछ सामान्य दिखता था, पर मेरे और चाची के बीच का राज़ गहरा हो चुका था। चाचा-चाची दस-बारह दिनों के लिए रुके हुए थे। फंक्शन के चक्कर में घर में आना-जाना लगा रहता था, पर मौका मिलते ही हम दोनों एक-दूसरे की ओर खिंच जाते।

अगले दिन दोपहर को चाचा किसी रिश्तेदार के यहाँ चले गए। मम्मी-पापा भी बाज़ार गए हुए थे। घर में फिर सिर्फ हम दोनों रह गए। चाची किचन में चाय बना रही थीं। मैं पीछे से गया और उनकी कमर में बाँहें डाल दीं।

“चाची… कल वाला वादा याद है?” मैंने उनके कान में फुसफुसाया। वह हल्की सी काँप गईं। “बेटा… अभी दिन है… कोई आ सकता है।” “कोई नहीं आएगा। दरवाज़ा बंद है।”

मैंने उनकी साड़ी का पल्लू सरकाया और ब्लाउज़ के हुक खोल दिए। गोरे गोल स्तन बाहर आ गए। मैंने दोनों हाथों से दबाए और निप्पल को उँगलियों में लेकर मसलने लगा। वह पीछे की तरफ झुक गईं। मेरा तना हुआ लंड उनकी गांड से सट गया।

“आह… राहुल… धीरे…” “कल तो आपने दोनों छेद दे दिए थे चाची। आज फिर से लेना है।”

मैंने उन्हें किचन के प्लेटफॉर्म पर लिटा दिया। साड़ी और पेटीकोट ऊपर कर दिए। पैंटी खींचकर फेंक दी। उनकी चूत अभी भी थोड़ी सूजी हुई थी कल की चुदाई से। मैंने लंड बाहर निकाला और सीधे अंदर धकेल दिया।

“उफ्फ्फ… अभी भी टाइट है…” “जोर से चोदो बेटा… कल वाला दर्द अभी भी है… पर अच्छा लग रहा है…”

मैंने उनकी टाँगें कंधों पर रख लीं और जोर-जोर से पेलने लगा। प्लेटफॉर्म पर थपक-थपक की आवाज़ गूँज रही थी। उनके स्तन हर धक्के पर हिल रहे थे। मैं झुककर एक स्तन मुँह में ले लिया और चूसने लगा।

थोड़ी देर बाद मैंने उन्हें घुमाया। अब उनकी गांड मेरी तरफ थी। मैंने थूक लगाकर गांड के छेद में लंड घुसाया। वह दर्द भरी आवाज़ में कराह उठीं, पर पीछे की तरफ धकेलने लगीं।

“आह्ह्ह… गांड फट रही है… पर मत निकालो… पूरा डालो…” “चाची की गांड अब मेरी हो गई है। चाचा को कभी नहीं दूँगा इतनी मज़ेदार गांड।”

मैं दोनों छेदों में बारी-बारी चोदता रहा। आखिर में उनकी चूत में ही पूरा माल भर दिया। वह थककर प्लेटफॉर्म से लिपट गईं।

रात को जब सब सो गए तो मैं चुपके से उनके कमरे में गया। चाचा गहरी नींद में खर्राटे ले रहे थे। चाची जाग रही थीं। मैंने उनके मुँह पर हाथ रखा और कान में कहा, “चुपचाप आओ।”

वह उठकर मेरे साथ मेरे कमरे में आ गईं। दरवाज़ा बंद करते ही मैंने उनके कपड़े उतार दिए। नंगी चाची मेरे सामने खड़ी थीं—गोरी चमकदार त्वचा, गोल भारी स्तन, पतली कमर और फैली हुई मुलायम गांड। मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटाया और खुद उनके ऊपर चढ़ गया।

“आज रात भर चोदूँगा आपको,” मैंने कहा। “चोदो… जितना मन करे… मेरी चूत और गांड दोनों तुम्हारी हैं।”

उस रात हमने तीन बार किया। पहले मैंने उनकी चूत चोदी, फिर उन्हें अपने ऊपर बिठाया। वह खुद मेरे लंड पर बैठकर हिल रही थीं। स्तन मेरे मुँह में ठूंस रही थीं।

“बेटा… तुम्हारा लंड इतना गहरा जाता है… चाचा का तो आधा भी नहीं पहुँचता था…” “अब रोज यही लंड लेना चाची। आदत डाल लो।”

दूसरी बार मैंने उनकी गांड में डाला। वह मुँह दबाकर कराह रही थीं ताकि आवाज़ बाहर न जाए। तीसरी बार सुबह होने वाली थी। मैंने फिर से उनकी चूत में झड़ते हुए पूरा बीज भर दिया।

अगले कुछ दिनों में मौका मिलते ही हम करते रहे। कभी दोपहर को जब घर खाली होता, कभी रात को जब सब सो जाते। एक दिन बाथरूम में भी कर लिया। वह नहा रही थीं। मैं अंदर घुस गया। गीले शरीर को पकड़कर दीवार से सटा दिया और खड़े-खड़े ही चोदने लगा। पानी गिर रहा था, उनके स्तन गीले चमक रहे थे। मैंने दोनों छेदों में बारी-बारी डाला।

“राहुल… कोई आ गया तो…” “आने दो… आज तो पूरा माल दोनों छेदों में भरके ही मानूँगा।”

उनके जाने से एक दिन पहले आखिरी मौका मिला। सब लोग फंक्शन की तैयारी में बाहर गए हुए थे। घर फिर खाली था। हम दोनों कमरे में थे। इस बार वह खुद सक्रिय थीं। उन्होंने मुझे बिस्तर पर लिटाया, लंड को मुँह में लिया और देर तक चूसा। फिर खुद ऊपर चढ़ गईं।

“आज तुम आराम से लेटो… मैं खुद लेती हूँ,” वह बोलीं। वह मेरे लंड पर बैठकर जोर-जोर से हिलने लगीं। स्तन मेरे चेहरे पर झूल रहे थे। मैंने दोनों हाथों से उनकी गांड पकड़ रखी थी और नीचे से धक्के मार रहा था।

“चाची… आपकी चूत मेरा लंड निगल रही है…” “निगल रही हूँ बेटा… पूरा निगल जाऊँगी… और जोर से…”

फिर उन्होंने खुद मुड़कर गांड के बल बैठ गईं। मैंने उनकी गांड में लंड डाल दिया। वह खुद हिल-हिलकर ले रही थीं। आखिर में मैंने उन्हें पेट के बल लिटाया और दोनों छेदों में बारी-बारी इतनी जोर से चोदा कि वह बिस्तर की चादर मुँह में दबाकर चीख रही थीं।

आखिरी बार मैंने उनकी चूत में गहराई तक लंड धँसाया और पूरा गाढ़ा माल अंदर उड़ेल दिया। वह मेरे नीचे काँप रही थीं।

“अब गाँव जा रही हो…” मैंने पसीने से तर माथे को चूमते हुए कहा। “हाँ… पर जब भी दिल्ली आऊँगी… सबसे पहले तुम्हारे पास आऊँगी। और तुम भी गाँव आ जाना कभी। वहाँ मौका ज्यादा मिलेगा।”

मैंने उन्हें कसकर पकड़ लिया। “वादा है ना चाची? मेरी चूत और गांड सिर्फ मेरे लंड के लिए रहेगी?” वह मुस्कुराईं और सिर हिलाया। “वादा है बेटा। अब सिर्फ तुम्हारा।”

अगले दिन वे गाँव वापस चले गए। स्टेशन पर विदा करते समय चाची ने मेरे हाथ में हल्के से दबाया। आँखों में वही शरारत थी।

घर लौटते समय मैं बार-बार उसी दिन की याद करता रहा—सोफे पर पहली बार उनकी चूत में घुसना, उनकी कराहें, दोनों छेदों में भरा हुआ मेरा माल, और वह वादा।

अब इंतज़ार था अगली मुलाकात का। जब वे फिर आएँगी… या मैं गाँव जाऊँगा। तब फिर से वही पाँच-छह घंटे नहीं, पूरे दिन और रात उनकी गोरी चिकनी बॉडी को अपनी बनाऊँगा।

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Sujit Rajgor
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