नौकरानी बोली प्रेग्नेंट हो जाऊँगी लड़के ने फिर भी बहुत चोदा

पैसे के लालच में नौकरानी ने सब कुछ खोल दिया। लड़के ने चूत ली, गाँड ली… नौकरानी चीखी प्रेग्नेंट हो जाऊँगी फिर भी उसने और जोर से चोदा!

लेखक: Rajesh7 मिनट पढ़ने में
नौकरानी बोली प्रेग्नेंट हो जाऊँगी लड़के ने फिर भी बहुत चोदा

उस दिन घर में सिर्फ दो लोग थे। सुबह-सुबह रोहन के पापा ऑफिस चले गए थे, मम्मी अपनी सहेली के घर चली गई थीं और छोटी बहन कॉलेज में थी। पूरा घर शांत और सुनसान पड़ा था। दोपहर की रोशनी खिड़कियों से अंदर आ रही थी।

रोहन 23 साल का था। पहली बार किसी औरत के इतने करीब आने वाला था। पिछले कई महीनों से घर की नौकरानी कविता उसके ख्यालों में बसी हुई थी। रात में अकेले लेटे-लेटे वही चेहरा, वही बॉडी याद आती थी।

कविता 35 साल की थी। शरीर से काफी जवान और आकर्षक लगती थी। गोरी चमकदार त्वचा, भारी भरी हुई चूचियाँ, पतली कमर और गोल कसी गाँड। साड़ी पहनने का अंदाज़ ऐसा था कि ब्लाउज़ के ऊपर से आधा हिस्सा साफ नज़र आता था। पैसे की तंगी की वजह से वह इस घर में काम करती थी। पति शराब पीता था, दो छोटे बच्चे थे। घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था।

रोहन रसोई में गया। कविता बर्तन धो रही थी। उसकी साड़ी पसीने से हल्की चिपक गई थी। रोहन का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। वह धीरे से पीछे गया और उसकी कमर पर हाथ रख दिया।

कविता चौंककर मुड़ी। “अरे बाबूजी… क्या कर रहे हो? छोड़ो…”

रोहन का गला सूख रहा था। “कविता… मैं… कई दिनों से तुम्हें देख रहा हूँ। रात भर नींद नहीं आती। तुम्हारा शरीर… तुम्हारी ये चूचियाँ… ये गाँड… मुझे पागल कर देती हैं।”

कविता ने उसका हाथ हटाने की कोशिश की लेकिन जोर नहीं था। “ऐसी बातें मत करो। मैं तुम्हारी उम्र की माँ लगती हूँ।”

“माँ नहीं लगती,” रोहन ने धीरे से कहा। उसने अपना हाथ पकड़कर कविता का हाथ अपनी पैंट पर रख दिया। अंदर मोटा लंड पूरी तरह तना हुआ था। “ये देखो… सिर्फ तुम्हें देखकर इतना सख्त हो गया है।”

कविता चुप हो गई। उसकी साँसें थोड़ी तेज़ हो गई थीं। रोहन ने जेब से पाँच हज़ार के नोट निकाले और प्लेटफ़ॉर्म पर रख दिए।

“ये लो। और भी मिल सकते हैं। बस आज… मना मत करना।”

कविता ने नोट्स को देखा। कुछ पल चुप रही। फिर धीमी आवाज़ में बोली, “तुमने मेरी मजबूरी का फायदा उठाया है बाबूजी…”

रोहन का हाथ काँप रहा था। उसने पीछे से चिपककर दोनों हथेलियाँ उसके ब्लाउज़ पर रख दीं। चूचियाँ धीरे-धीरे दबाने लगा। निप्पल उंगलियों में लेकर हल्के से मसलने लगा।

कविता की आँखें बंद हो गईं। “आह्ह… हल्के से… पहली बार किसी ने ऐसे छुआ है सालों बाद…”

रोहन ने ब्लाउज़ के हुक खोले। भारी, नरम चूचियाँ बाहर आ गईं। वह एक निप्पल मुँह में लेकर धीरे-धीरे चूसने लगा। जीभ से घुमाया, हल्का काटा। कविता का हाथ उसके बालों में चला गया।

थोड़ी देर बाद रोहन ने साड़ी का पल्लू हटाया और उसे थोड़ा आगे की तरफ झुका दिया। पैंट के ऊपर से ही अपना तना लंड उसकी गाँड पर घिसने लगा। फिर एक हाथ आगे बढ़ाकर पैंटी के ऊपर से उसकी चूत सहलाने लगा। पैंटी पहले से गीली थी।

“इतनी गीली हो गई?” रोहन ने हैरानी से कहा।

कविता शर्मा गई। “बाबूजी… मत पूछो…”

रोहन ने पैंटी को एक तरफ सरकाया। पहली बार किसी औरत की चूत इतने करीब से देख रहा था। उसने घुटनों के बल बैठकर धीरे से जीभ लगाई। कविता का शरीर काँप उठा। रोहन ने आगे से चूत चाटी, फिर थोड़ा पीछे जाकर गाँड के छेद को भी चाटने लगा। कविता काउंटर पकड़कर खड़ी रही।

“आह्ह… दोनों जगह… बाबूजी…”

रोहन का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। वह खड़ा हुआ। पैंट खोली। पहली बार किसी औरत के सामने लंड बाहर निकाला। मोटा, नसों वाला, ऊपर से पहले से गीला। कविता ने देखा और उसकी आँखें थोड़ी फैल गईं।

रोहन घबराया हुआ था। वह लंड लेकर कविता की चूत के पास ले गया लेकिन ठीक से समझ नहीं पा रहा था कि कहाँ लगाना है। सिर इधर-उधर फिसल रहा था।

कविता ने धीरे से मुस्कुराते हुए उसका लंड अपने हाथ में लिया। “इधर… यहीं लगाना है,” उसने कहा और अपने चूत के मुँह पर लंड का मोटा सिरा सही जगह रख दिया। फिर खुद थोड़ा नीचे को धक्का दिया।

लंड का सिरा अंदर गया।

रोहन की साँस रुक गई। अंदर बहुत गर्म और गीला था। दीवारें नरम लेकिन कसकर जकड़ रही थीं। जैसे कोई गर्म, गीला मुँह उसे चूस रहा हो।

“उह्ह्ह… कितनी टाइट है…” रोहन की आवाज़ काँप गई।

कविता ने धीरे से कहा, “आगे बढ़ो… धीरे-धीरे पूरा डालो।”

रोहन ने और अंदर धकेला। कविता की माथे पर पसीना आ गया। “आह्ह… बहुत दिन बाद इतना मोटा… धीरे बाबूजी…”

जब पूरा लंड अंदर तक चला गया तो दोनों कुछ पल रुक गए। रोहन को लग रहा था कि उसकी चूत उसे चारों तरफ से जकड़े हुए है—गरम, फिसलन भरी और बहुत टाइट।

फिर उसने धीरे-धीरे धक्के शुरू किए। पहले बहुत धीमे। कविता की चूचियाँ उसके हाथ में थीं। वह उन्हें दबा रहा था, निप्पल मरोड़ रहा था।

“मेरे पेट तक जा रहा है… इतना मत चोदो… प्रेग्नेंट हो जाऊँगी…” कविता कराह रही थी।

रोहन का आत्मविश्वास बढ़ रहा था। उसने रफ्तार थोड़ी तेज़ कर दी। कविता की आवाज़ें निकलने लगीं।

थोड़ी देर बाद उसने उसे घुमाया और पीछे से लिया। एक हाथ बालों में, एक हाथ चूची पर। धक्के और गहरे हो गए।

“रंडी बना दिया तूने मुझे…” कविता ने हाँफते हुए कहा।

रोहन ने लंड निकाला और गाँड के छेद पर रखा। कविता सहम गई। “वहाँ… पहली बार… दर्द होगा…”

रोहन ने थूक लगाया। कविता ने खुद थोड़ा फैलाया। रोहन ने धीरे-धीरे सिरा अंदर किया। कविता की आँखें बंद हो गईं। “आह्ह्ह… चमड़ी फट रही है… धीरे…”

धीरे-धीरे पूरा अंदर गया। रोहन को लग रहा था कि गाँड चूत से भी ज्यादा टाइट है। वह बहुत धीरे धक्के मारने लगा। कविता दर्द और मज़े के मेल में कराह रही थी।

“मत निकालना… थोड़ा और… आदत पड़ रही है…”

रोहन ने करीब कुछ मिनट गाँड ली। फिर वापस चूत में डाल दिया। उसने कविता को पास वाले कमरे में बिस्तर पर लिटाया। मिशनरी में दोनों पैर कंधों पर रखकर गहराई तक जाने लगा।

“पूरा लंड पेट में घुस रहा है… बाबूजी… बहुत जोर से…”

फिर कुत्ते की पोजीशन। गाँड ऊपर। रोहन बारी-बारी से दोनों जगह डाल रहा था। कविता की आवाज़ें अब और तेज़ हो गई थीं।

आखिर में उसने कविता को अपनी गोद में बैठा लिया। कविता खुद ऊपर-नीचे होने लगी। रोहन दोनों चूचियाँ मुँह में लिए हुए था।

“अंदर छोड़ने वाला हूँ…” रोहन ने हाँफते हुए कहा।

कविता ने उसके गले में बाँहें डाल दीं। “छोड़ दो… आज के पैसे में ये भी शामिल है… भर दो अंदर…”

रोहन ने जोर से कमर उठाई और पहली बार किसी औरत के अंदर अपना पूरा गरम माल छोड़ दिया। धार की धार जाती रही। कविता भी उसके शरीर से चिपककर काँपते हुए झड़ गई। उसकी चूत लंड को जोर से जकड़े हुए थी।

दोनों पसीने से लथपथ हो गए थे। रोहन अभी भी अंदर था। उसका शरीर काँप रहा था। पहली बार का अनुभव इतना तेज़ था कि वह बोल भी नहीं पा रहा था।

कविता ने धीरे से उसके बाल सहलाते हुए कहा, “पहली बार था ना तुम्हारा… पता चल गया।”

रोहन ने सिर्फ सिर हिलाया।

कविता मुस्कुराई। “कल और पैसे लेकर आना बाबूजी… आज वाली रकम कम है।”

रोहन ने उसे और कस लिया। बाहर घर अभी भी शांत था। लेकिन अंदर दोनों के बीच कुछ नया शुरू हो चुका था।

अगली दोपहर फिर घर पूरी तरह सुनसान था। रोहन आज सुबह से ही बेचैन था। कल वाली रात बार-बार याद आ रही थी—कविता की गर्म और टाइट चूत, उसकी कराहें, और जब उसने अंदर छोड़ा था तो वह कैसा महसूस हुआ था। आज उसने पहले से पंद्रह हज़ार के नोट निकालकर रखे थे।

कविता रसोई में काम कर रही थी। जब रोहन अंदर घुसा तो उसने मुस्कुराते हुए पूछा, “आज वाले पैसे बाबूजी?”

रोहन ने नोट्स उसकी हथेली पर रख दिए। कविता ने गिने और ब्लाउज़ के अंदर छुपा लिए। फिर धीरे से बोली, “आज जल्दी मत करना… कल बहुत जोर से किया था। थोड़ा संभाल के…”

रोहन ने जवाब में कुछ नहीं कहा। बस पीछे से जाकर उसकी कमर पकड़ ली और ब्लाउज़ के अंदर दोनों हाथ डाल दिए। नंगी चूचियाँ उसके हाथों में आ गईं। वह उन्हें जोर से दबाने लगा, निप्पल को उंगलियों के बीच लेकर मरोड़ने और खींचने लगा।

कविता की कमर पीछे को मुड़ गई। “आह्ह… आज भी उतनी ही बेचैनी है तुम्हारे अंदर…”

रोहन ने ब्लाउज़ पूरी तरह खोल दिया। भारी चूचियाँ बाहर झूलने लगीं। उसने एक निप्पल मुँह में लिया और जोर से चूसने लगा। दाँतों से हल्का काटा, जीभ से गोल-गोल घुमाया। दूसरा हाथ साड़ी के ऊपर से गाँड पर था। वह गाँड को मसल रहा था, दोनों गाल फैला रहा था, बीच-बीच में थप्पड़ भी मार रहा था।

थोड़ी देर बाद उसने कविता को काउंटर की तरफ धकेलकर झुका दिया। साड़ी कमर तक ऊपर की और पैंटी के ऊपर से ही अपना तना लंड उसकी गाँड पर जोर-जोर से घिसने लगा।

“कल रात ये गाँड याद आती रही,” रोहन ने भारी आवाज़ में कहा।

उसने पैंटी को साइड में सरकाया। पहले दो उंगलियाँ चूत में डालीं—अंदर पहले से गीला और गर्म था। फिर वही उंगलियाँ निकालकर गाँड के छेद पर ले जाकर घुमाने लगा। कविता का शरीर तन गया।

रोहन घुटनों के बल बैठ गया। पहले आगे से चूत पर मुँह लगाया। जीभ अंदर तक घुसाई, चूसा, चाटा। कविता की जाँघें काँपने लगीं। फिर वह पीछे गया और गाँड के छेद को भी अच्छी तरह गीला करने लगा। जीभ अंदर तक ले जा रहा था।

“आह्ह बाबूजी… दोनों जगह एक साथ… पागल हो गए हो क्या…” कविता कराह रही थी।

रोहन खड़ा हुआ। पैंट पूरी तरह उतार दी। मोटा लंड बाहर था। उसने कविता को घुटनों पर बैठाया और लंड उसके मुँह के सामने कर दिया।

“आज गला साफ करना है। पूरा अंदर ले।”

कविता ने लंड हाथ में लिया और मुँह में डाल लिया। रोहन ने उसके बाल पकड़कर धीरे-धीरे धक्के मारने शुरू किए। पहले हल्के, फिर गहरे। लंड गले तक जा रहा था। कविता की आँखों से आँसू बहने लगे, लेकिन वह रोक नहीं रही थी। लार उसकी ठुड्डी से होती हुई चूचियों तक टपक रही थी।

“गला तक घुस रहा है… साँस नहीं आ रही…” कविता ने मुँह हटाकर कहा।

रोहन ने उसे खड़ा किया। पैंटी एक तरफ की। अपनी उंगली पर थूक लगाकर चूत पर मल दिया। फिर साइड से चिपककर एक हाथ से दोनों चूचियाँ जोर से दबाते हुए लंड उसकी चूत में धकेल दिया।

इस बार रोहन ने एकदम अंदर तक ठूस दिया।

“उह्ह्ह… बाबूजी… बहुत गहरा… पेट तक जा रहा है…” कविता चीखी।

रोहन ने उसे बाँहों में जकड़ लिया। एक हाथ चूचियों पर, दूसरा पेट पर रखकर जोर-जोर से धक्के मारने लगा। हर धक्के के साथ कविता की आवाज़ निकल रही थी। चूत की दीवारें उसके लंड को कसकर जकड़ रही थीं—गरम, फिसलन भरी और बहुत टाइट।

“मेरे पेट में पूरा लंड घुस रहा है… इतना जोर से मत चोदो… प्रेग्नेंट हो जाऊँगी…”

“हो जा… पैसे और मिलेंगे,” रोहन ने कान में कहा और रफ्तार और बढ़ा दी।

थोड़ी देर बाद उसने कविता को घुमाया। पीछे से कमर पकड़कर फिर से चूत में डाल दिया। एक हाथ बाल खींच रहा था, दूसरा चूची मसल रहा था। धक्के इतने तेज़ थे कि काउंटर हिल रहा था।

“रंडी बना दिया तूने मुझे… पूरी तरह से…” कविता हाँफते हुए बोली।

रोहन ने अचानक लंड निकाला। थूक लगाकर गाँड के छेद पर रखा। कविता सहम गई लेकिन मना नहीं किया। रोहन ने धीरे-धीरे सिरा अंदर किया।

“आह्ह्ह… चमड़ी फट रही है… दर्द हो रहा है बाबूजी…”

रोहन रुक-रुक कर अंदर जाता रहा। जब आधा लंड समा गया तो उसने कविता की कमर कसकर पकड़ी और बाकी हिस्सा एक धक्के में अंदर कर दिया। कविता जोर से चिल्लाई। आँखों से आँसू बहने लगे।

“पूरा अंदर है… अब हिलना…” रोहन ने कहा।

वह बहुत धीरे धक्के मारने लगा। गाँड चूत से भी ज्यादा टाइट थी। हर धक्के के साथ कविता की आवाज़ बदल रही थी—दर्द से मज़े की तरफ।

“मत निकालना… थोड़ा और… आदत पड़ रही है… चोदो…”

रोहन ने करीब बीस मिनट उसकी गाँड ली। बीच-बीच में निकालकर चूत में डालता, फिर वापस गाँड में ठूस देता। कविता कई बार काँप चुकी थी। उसकी जाँघें थरथर काँप रही थीं।

फिर रोहन उसे कमरे में ले गया। बिस्तर पर लिटाया। मिशनरी में दोनों पैर कंधों पर रखकर पूरा वजन डालकर चोदने लगा। लंड हर बार गहराई तक जा रहा था।

“पूरा लंड पेट में घुस रहा है… मेरी चूत फाड़ दी तूने… मदarchod…” कविता बड़बड़ा रही थी।

रोहन ने उसके दोनों हाथ पकड़कर सिर के ऊपर दबा दिए और और जोर से धक्के मारने लगा। कविता की चूचियाँ जोर-जोर से हिल रही थीं।

फिर कुत्ते की पोजीशन। गाँड ऊपर उठी हुई। रोहन बारी-बारी से चूत और गाँड दोनों में डाल रहा था। थप्पड़ मार रहा था। बाल खींच रहा था। कविता अब सिर्फ कराह रही थी, बोल नहीं पा रही थी।

आखिर में रोहन ने उसे अपनी गोद में बिठा लिया। कविता खुद उसके लंड पर बैठकर ऊपर-नीचे होने लगी। रोहन दोनों चूचियाँ मुँह में लेकर जोर-जोर से चूस रहा था, काट रहा था।

“अंदर छोड़ने वाला हूँ… पूरा…” रोहन की आवाज़ काँप रही थी।

कविता ने उसके बाल पकड़ लिए और जोर से नीचे बैठ गई। “छोड़ दो… अंदर ही छोड़… भर दो मुझे पूरी तरह…”

रोहन ने कमर जोर से उठाई और अपना सारा गरम, गाढ़ा माल उसकी चूत के अंदर उड़ेल दिया। इतना ज्यादा कि बाहर भी बहने लगा। कविता भी उसके शरीर से चिपककर जोर से काँपते हुए झड़ गई। उसकी चूत लंड को तब तक जकड़े रही जब तक रोहन का पानी पूरी तरह निकल नहीं गया।

दोनों पसीने से लथपथ हो गए थे। रोहन अभी भी अंदर था। शरीर काँप रहा था।

कुछ देर सन्नाटा रहा। फिर कविता ने धीरे से कहा, “बाबूजी… अगर रोज ऐसा करोगे तो मैं चल भी नहीं पाऊँगी घर में…”

रोहन ने उसका माथा चूमते हुए जवाब दिया, “तो फिर लेटकर काम करना। पैसे तो मिलते ही रहेंगे।”

कविता हल्की थकी हुई मुस्कान के साथ बोली, “कल बीस हज़ार लेकर आना… और थोड़ा संभाल के करना। आज बहुत अंदर तक चले गए थे।”

रोहन ने उसका एक निप्पल फिर से मुँह में ले लिया और धीरे से कहा, “कल और गहराई तक जाऊँगा… तैयार रहना।”

कविता ने उसकी तरफ देखा। आँखों में थकान, मज़ा, और थोड़ी सी मजबूरी Sab मिल रही थी।

“जैसा कहो बाबूजी… बस अगली बार थोड़ा प्यार से शुरू करना।”

रोहन ने उसे और कस लिया। बाहर घर अभी भी शांत था। लेकिन दोनों के बीच का यह रिश्ता अब सिर्फ पैसे का सौदा नहीं रह गया था।

कहानी
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Rajesh
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