भर रात नंगी माँ की टाइट चूत और गांड की छेद चोदा - हिंदी सेक्स स्टोरी
मेरी अपनी 40 साल की नंगी माँ… टाइट चूत और गाँड की छेद बिल्कुल कच्ची। मैंने भर रात उसे इतना चोदा कि वो रोने लगी। सबसे गंदी और असली माँ-बेटा वाली रात जो पढ़ते ही लंड फाड़ देगी।
रोहन बीस साल का था। दिल्ली के एक छोटे से फ्लैट में वह अपने पापा के साथ अकेला रहता था। कॉलेज का पहला साल चल रहा था। पापा दिनभर जॉब पर रहते थे, इसलिए घर में अक्सर सन्नाटा पसरा रहता। साल में एक बार गर्मी की छुट्टियों में दोनों गाँव जाते थे—वहाँ दादी-दादा और बड़े चाचा की फैमिली रहती थी।
इस बार भी जून की चिलचिलाती गर्मी में पापा ने कहा, “चल, गाँव चलते हैं। माँ को भी थोड़ा समय मिल जाएगा।” रोहन के मन में एक अजीब-सी गुदगुदी हुई। माँ… चालीस साल की, लेकिन देखने में तीस की भी नहीं लगती थीं। गोरी, चिकनी त्वचा, पतली सिल्क की साड़ी जो उनके भारी-भरकम बॉडी पर कस-कस कर चढ़ जाती। बड़े-बड़े गोल चूचे जो साड़ी के पल्लू के नीचे से भी अपना आकार दिखाते, और गाँड… इतनी भारी और गोल कि पीछे से देखते ही लंड खड़ा हो जाता।
वह गाँव में दादी-दादा का ध्यान रखती थीं, चाचा के घर के काम भी करतीं, लेकिन रोहन के लिए वह बस “माँ” नहीं थीं। उसके लिए वह एक जिस्म थी जो रात-रात भर उसके ख्वाबों में नंगी घूमती थी।
गाँव पहुँचे। पुराना कच्चा-पक्का घर। रोहन को अलग कमरे में सुलाया गया। पापा-माँ एक साथ सोए। पहली रात से ही रोहन की नींद उड़ गई। माँ की नरम साँसें, उनकी साड़ी की सरसराहट, और कभी-कभी कमरे से आती धीमी सिसकारियाँ… सब उसके लंड को पत्थर बना देतीं।
तीसरे दिन रात को प्यास लगी। पानी पीने उठा। घर बिल्कुल शांत था। तभी उसने अजीब-सी आवाज़ सुनी—धीमी, दबी हुई, दर्द और मजे मिली-जुली।
“आआआह्ह… मर गई… साल भर का एक ही दिन… इतना गहरा… हाये… धीरे… बहुत दुख रहा है…” माँ की आवाज़ थी। रोने जैसी, मगर अंदर से गीली।
रोहन का दिल धड़कने लगा। वह बिल्कुल चुपके से उस कमरे के पास गया जहाँ पापा-माँ सोए थे। किवाड़ थोड़ा खुला था। अंदर से हल्का-सा दिया जल रहा था। उसने आँख लगाई…
नजारा देखकर उसका लंड एक झटके से टाइट पैंट में फूल गया।
माँ पेट के बल लेटी थीं। पापा उनके पीछे थे। माँ की सिल्क साड़ी कमर तक उठी हुई, ब्लाउज के बटन खुले, बड़े-बड़े गोरे चूचे बाहर निकल आए थे। पापा एक हाथ से उन्हें दबाए जा रहे थे, दूसरे हाथ से माँ की कमर पकड़े हुए उनकी चूत में पीछे से अपना मोटा लंड बिल्कुल डीप तक घुसाए जा रहे थे।
“उफ्फ्फ… साली… कितनी टाइट है अभी भी… साल भर बाद…” पापा गरज रहे थे। माँ सिर्फ करवट ले रही थीं, मुँह तकिए में दबाए।
“आआआह्ह… मत इतना अंदर… निकल जाएगा… हाये…”
उनकी चूत बिल्कुल पिंक और गीली चमक रही थी। पापा के लंड पर उनका पानी चिपक रहा था। फिर पापा ने उन्हें एकदम से उल्टा किया। माँ की पीठ ऊपर, गाँड हवा में। पापा ने पहले उनकी गाँड के छेद को जीभ से चाटा, चूसा, फिर अपना लंड उस छोटे से छेद पर रख दिया। “अब गाँड दूँगा… साल भर से रही है…”
“नहीं… बहुत बड़ा है… फट जाएगी… आआआह्ह्ह्ह!” पापा ने धीरे-धीरे पूरा लंड गाँड के छेद में धकेल दिया। माँ की चीखें दबी हुई निकल रही थीं। पापा जोर-जोर से धक्के मार रहे थे, गाँड का मांस हिल रहा था, चूचे नीचे गद्दे पर रगड़ खा रहे थे। अंत में पापा ने एक लंबा कराह निकाला और अपना पूरा माल माँ की गाँड के छेद के अंदर ही उछाल दिया। माँ काँप उठीं। पापा उनके ऊपर लेट गए। माँ की गाँड के छेद से सफेद गाढ़ा वीर्य बाहर निकलकर उनकी जाँघों पर बह रहा था। पिंक चूत भी हाँफ रही थी, बिल्कुल खुली हुई।
रोहन देखते-देखते पागल हो गया। उसने तुरंत बाथरूम में जाकर तीन बार झड़ लिया, बस माँ की उस गाँड, उस चूत और उन बड़े चूचों को याद करके।
अगली सुबह ही पापा को ऑफिस से अर्जेंट कॉल आया। “बेटा, मुझे तुरंत दिल्ली जाना पड़ेगा। बहुत जरूरी काम आ गया। तू पंद्रह दिन और रह जा। माँ के साथ। बाद में ट्रेन से आ जाना।”
पापा जल्दी-जल्दी निकल गए। अब घर में सिर्फ रोहन, माँ, दादी-दादा और चाचा लोग। मगर रात को सब अपने कमरों में चले जाते। रोहन और माँ का फ्लोर अलग-सा हो गया।
पहले दिन से ही रोहन ने मौका ढूँढ़ना शुरू किया। “माँ, यह लोटा भारी है, मैं उठा दूँ?” कहते हुए उनकी कमर पर हाथ रख देता।
“माँ, आपकी साड़ी का पल्लू सरक गया,” कहते हुए जान-बूझकर उनके चूचे के ऊपर से हाथ फेर देता।
माँ पहले शर्मातीं, फिर मुस्कुरातीं। “पागल है क्या? बड़ा हो गया है तू…” मगर उनकी आँखों में भी एक अजीब-सी गीलापन था। वह भी अपने बेटे को अब अलग नजर से देखने लगी थीं—उसके चौड़े सीने, टाइट जींस में उभरते लंड को।
रोहन रोज बाथरूम में जाकर माँ की पहनी हुई पेटीकोट और पैंटी चुराता, उन्हें सूंघता, मुँह पर रखकर मुठ मारता और फिर वापस रख देता। एक दिन तो पैंटी में ही झड़ दिया था।
फिर एक रात… बारिश हो रही थी। बिजली कड़क रही थी। रोहन ने माँ के कमरे का किवाड़ खटखटाया। “माँ… मुझे डर लग रहा है अकेले… क्या मैं आपके पास सो सकता हूँ? पापा की जगह…” माँ थोड़ी देर चुप रहीं। फिर बोलीं, “चल आ जा… लेकिन सीधा सोना। कोई शरारत नहीं।”
रोहन माँ के बिस्तर पर आ गया। माँ ने सिल्क की नाइटी पहनी थी, नीचे सिर्फ पैंटी। अंधेरा था, सिर्फ बिजली की चमक। पहले तो दोनों अलग-अलग लेटे। मगर धीरे-धीरे रोहन ने करवट ली। उसने पीछे से माँ को जाकर लिपट लिया। माँ की नरम गाँड उसके लंड पर पड़ी थी।
उसने धीरे से हाथ बढ़ाया और माँ की गाँड को मसला। गोल, नरम, भारी। फिर हाथ आगे ले जाकर उनके चूचों पर रख दिया। ब्लाउज के नीचे कोई ब्रा नहीं थी। सिर्फ नंगे, बड़े, गरम चूचे। उसने उन्हें दबाया, निप्पल्स को उंगलियों से बेला।
माँ की साँस तेज हो गई। “रोहन… क्या कर रहा है… बेटा…” “माँ… चुप… बस थोड़ा…” उसने कान में हाँफते हुए कहा।
उसने माँ की गाँड के बीच अपना मुँह लगाया, पैंटी के ऊपर से ही सूंघा, जीभ फेरी। फिर लंड निकालकर उनकी गाँड की दरार में रगड़ने लगा। माँ करवटती रहीं, मगर रोक नहीं रही थीं। उनका बॉडी गरम हो चुका था।
उस रात रोहन बस यही करता रहा—चूचे दबाना, गाँड मसलना, लंड रगड़ना, निप्पल्स चूसना। सुबह होने से पहले उसने अपना माल माँ की नाइटी पर ही झड़ दिया। माँ ने कुछ नहीं कहा। बस आँखें बंद किए रहीं।
अगली रात फिर वही। और अगली रात… इस बार रोहन ने हिम्मत की। माँ सो रही थीं (या सोए होने का नाटक कर रही थीं)। उसने उनकी साड़ी का पल्लू हटाया, ब्लाउज के बटन खोले, चूचे बाहर निकाले और बुरी तरह से चूसने लगा। फिर हाथ नीचे ले जाकर पैंटी सरका दी। माँ की चूत बिल्कुल गीली थी, बाल कम, पिंक, फूली हुई। उसने दो उंगलियाँ अंदर डाल दीं।
माँ की आँख खुल गई। “रोहन… बेटा… नहीं… यह गलत है… मैं तेरी माँ हूँ…”
रोहन ने उनके मुँह पर हाथ रख दिया। “माँ… प्लीज… मैं पागल हो रहा हूँ… उतने दिन से… मैं आपको चोदना चाहता हूँ… प्लीज माँ… एक बार… पापा नहीं हैं… कोई नहीं जानेगा…”
माँ की आँखों में आँसू आ गए, मगर उनका बॉडी धोखा दे रहा था। चूत से पानी निकल रहा था। “बेटा… मत कर… तेरा लंड बहुत बड़ा लग रहा है… मैं नहीं ले पाऊँगी… पापा ने ही इतना… आआआह्ह!”
रोहन ने उनकी टाँगें फैलाईं, अपना लंड उनकी चूत के छेद पर रखा और एक जोर का धक्का मारा। “आआआह्ह्ह्ह… मर गई… निकल… बहुत मोटा है… फट गई…”
लेकिन रोहन रुकने वाला नहीं था। उसने पूरा लंड अंदर तक धकेल दिया। माँ की चूत ने उसके लंड को बुरी तरह से कस लिया। फिर शुरू हुआ असली चोदना…
रोहन ने माँ को पेट के बल लिटाया, गाँड ऊपर की, और पीछे से इतनी जोर से चोदा कि बिस्तर की कराहट निकलने लगी। एक हाथ से चूचे दबाता, दूसरे से उनके बाल पकड़कर मुँह पीछे खींचता।
“माँ… कितनी टाइट चूत है आपकी… पापा के बाद भी… उफ्फ्फ…” “बेटा… धीरे… मर जाऊँगी… आआआह्ह… और गहरा मत… हाये…”
फिर उसने माँ को अपने ऊपर बैठाया। माँ की भारी गाँड उसके पेट पर पड़ रही थी, चूचे उसके मुँह में। रोहन ने नीचे से धक्के मारने शुरू किए। माँ बस ऊपर-नीचे हो रही थीं, मुँह से सिर्फ सिसकारियाँ निकल रही थीं।
“रोहन… बस… निकाल दे अंदर… मेरी चूत में… मैं नहीं रोक पाऊँगी…” रोहन ने और तेजी से चोदा। अंत में एक लंबा कराह निकालते हुए अपना पूरा माल माँ की चूत के अंदर उड़ा दिया। इतना ज्यादा कि बाहर निकलकर उनकी जाँघों पर बहने लगा।
माँ थककर उसके सीने पर गिर गईं, हाँफ रही थीं। रोहन अब भी उनके अंदर ही था। उसने धीरे से कहा, “माँ… अब मैं हर रात आपको चोदूँगा… पंद्रह दिन… आप मेरी हो गईं…”
माँ ने बस आँखें बंद किए हुए धीरे से कहा, “बेटा… जो करना है कर ले… लेकिन किसी को पता नहीं चलना चाहिए… और… थोड़ा तो रहम कर… तेरी माँ हूँ मैं…”
उस रात रोहन ने माँ को दो बार और चोदा—एक बार उनकी गाँड में, एक बार फिर चूत में। सुबह होने तक माँ की चूत, गाँड और मुँह सब उसके वीर्य से भर चुके थे। उनकी साड़ी बिल्कुल गीली हो चुकी थी। रोहन ने उन्हें अपनी बाँहों में लिए हुए सोया, लंड अब भी उनकी नरम गाँड के बीच दबा हुआ।
पंद्रह दिन बीत चुके थे। कल सुबह रोहन की ट्रेन थी। आज गाँव की आखिरी रात थी। दिनभर रोहन ने माँ को देखते ही नहीं छोड़ा। उनकी हर नज़र, हर झुकाव, हर चलने का अंदाज़ उसके लंड को पागल कर रहा था। माँ भी जानती थीं आज क्या होने वाला है। उनकी आँखों में डर भी था, मगर उसके नीचे एक गीली, गंदी भूख भी छिपी थी।
रात के दस बजे सब सो गए। दादी-दादा और चाचा लोग अपने कमरों में बंद। घर बिल्कुल सुनसान। रोहन ने माँ के कमरे का किवाड़ बंद किया, कुंडी लगा दी। माँ बिस्तर पर बैठी थीं, सिल्क की लाल साड़ी पहने, ब्लाउज टाइट, पल्लू सीने पर। उनके चेहरे पर लाली थी।
रोहन ने आकर उनके सामने खड़े होकर अपनी जींस और अंडरवियर एक झटके में नीचे गिरा दी। उसका लंड बिल्कुल सीधा, मोटा, नसें उभरी हुई, टॉप से पहले से ही पानी टपक रहा था। “माँ… आज आखिरी रात है। आज मैं तुम्हें पूरी तरह से खा जाऊँगा। कोई रोक-टोक नहीं।”
माँ ने आँखें नीचे कीं, आवाज़ काँपी हुई, “बेटा… मत कर आज इतना… कल तुझे जाना है… और… तेरे पापा ने जाने से पहले इतना चोदा था कि अभी भी चूत और गाँड दर्द कर रही है… प्लीज थोड़ा रहम कर…”
रोहन हँसा। उसने आगे बढ़कर माँ के बाल पकड़े और उनका मुँह अपने लंड पर दबा दिया। “पहले चूस। अच्छे से। गहरे तक।”
माँ ने मुँह खोला। रोहन ने अपना लंड उनके गले तक एक ही धक्के में घुसा दिया। माँ गैग होने लगीं, आँखों से पानी आ गया, लेकिन रोहन ने बाल पकड़े हुए उनके मुँह में हिलना शुरू कर दिया।
“ग्र्र्र्र… हाँ ऐसे… जीभ घुमाना… अंदर तक ले… साली… कितनी गंदी लग रही हो आज…” थूक माँ के मुँह से निकल-निकल कर उनके चूचों पर गिर रहा था। रोहन ने दस मिनट तक उनका मुँह चोदा, फिर लंड निकाला। माँ हाँफ रही थीं, थूक से लथपथ।
उसने माँ को उठाया और साड़ी का पल्लू झटक दिया। ब्लाउज के सारे बटन एक-एक करके फाड़ दिए। बड़े-बड़े गोरे चूचे बाहर आ गए, निप्पल्स पहले से ही सख्त। रोहन ने उन्हें मुँह में भर लिया, इतनी जोर से चूसा कि माँ की सिसकारी निकल गई। “आआआह्ह… बेटा… काट मत… हाये…” उसने दोनों चूचों को एक साथ दबाया, निप्पल्स को दाँतों से कुचला, जीभ से गोला। फिर नीचे बैठ गया। साड़ी बिल्कुल ऊपर कर दी, पेटीकोट और पैंटी एक साथ खींचकर फाड़ दी। माँ अब बिल्कुल नंगी थीं – सिर्फ कमर में साड़ी का कमरबंद बाकी था।
रोहन ने माँ की टाँगें फैलाकर उनकी चूत को देखने लगा। पिंक, सूजी हुई, पंद्रह दिन से रोज चुदने की वजह से हल्की-सी लाल, मगर अभी भी टाइट। उसने पहले दो उंगलियाँ अंदर डालीं, फिर तीसरी। “उफ्फ्फ माँ… कितनी गीली हो… पापा के बाद भी यह चूत पानी निकाल रही है मेरे लिए…”
उसने मुँह लगाया। जीभ से क्लिटोरिस को चाटने लगा, चूत के अंदर जीभ घुसाई, गाँड के छेद को भी साफ चाटने लगा। माँ के दोनों हाथ उसके बालों में थे, कमर हिल रही थी। “रोहन… आआआह्ह… जीभ… और अंदर… हाये मैं गीली हो जाऊँगी…”
जब माँ पहली बार झड़ने के करीब आईं, रोहन ने मुँह हटाया। उसने माँ को पेट के बल लिटाया, गाँड ऊपर की, दो तकियों से उनकी कमर ऊँचा कर दिया। फिर अपना लंड उनकी चूत पर रखकर एक ही जोर के धक्के में पूरा अंदर तक घुसा दिया। “आआआह्ह्ह्ह… मर गई… निकल… बहुत गहरा… पापा से भी गहरा… हाये!” रोहन ने दोनों हाथ से उनकी कमर पकड़ी और बिल्कुल जानवर की तरह धक्के मारने शुरू किए। थप-थप-थप की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज रही थी। माँ की भारी गाँड हिल-हिल रही थी, चूचे नीचे बिस्तर पर रगड़ खा रहे थे। “माँ… बोल… किसकी चूत है यह?”
“त-तेरी… बेटा… तेरी चूत… आआआह्ह… और जोर से… नहीं… रुको… दर्द… आआआह्ह!” रोहन नहीं रुका। उसने माँ के बाल पकड़कर मुँह पीछे खींच लिया और कान में चिल्लाया, “आज मैं तुम्हारी चूत, गाँड और मुँह तीनों को फाड़ दूँगा। पंद्रह दिन का हिसाब एक रात में!”
एक घंटे तक बस चूत मारी। माँ दो बार झड़ चुकी थीं, मगर रोहन का लंड अभी भी पत्थर। फिर उसने लंड निकाला और सीधा गाँड के छेद पर रख दिया।
माँ चिल्लायीं, “नहीं बेटा… गाँड मत… अभी दर्द कर रही है… तेरे पापा ने भी लास्ट टाइम गाँड में ही डाला था… प्लीज… फट जाएगी… आआआह्ह्ह्ह!”
रोहन ने थूक लगाया और धीरे-धीरे पूरा लंड गाँड के टाइट छेद में धकेल दिया। माँ का बॉडी अकड़ा हुआ था, मुँह से दबी की आवाज़ निकल रही थी।
“स्स्स्स… कितनी टाइट गाँड है अभी भी… साली… अंदर से गरम…” फिर उसने गाँड चोदनी शुरू की – पहले धीरे, फिर इतनी तेजी से कि माँ की चीखें दबी-दबी निकलने लगीं। एक हाथ से उनकी चूत में तीन उंगलियाँ घुसाए रखी थीं, दूसरे से चूचे दबा रहा था।
“बेटा… निकाल दे… बहुत दर्द… मैं नहीं ले पाऊँगी… प्लीज… आ… आआआह्ह!” रोहन ने और गहरा किया। “ले लेगी। आज तो लेकर रहेगी।” उसने माँ को उल्टा किया, उनकी टाँगें कंधे पर रखकर मिशनरी में पहले चूत फिर गाँड पर अटैक किया। हर धक्के पर माँ की आँखें पलटती जा रही थीं।
रात के दो बज चुके थे। रोहन ने माँ को 69 में लिटाया। माँ ने नीचे से उसका लंड चूसना शुरू किया (मजबूरी में), और ऊपर से रोहन उनकी चूत और गाँड दोनों चाट रहा था, उंगलियाँ डाल-डाल कर। फिर उसने माँ को अपने लंड पर बैठाया – पहले चूत में, फिर उठाकर गाँड में। माँ की भारी बॉडी उसके ऊपर उछल रही थी, चूचे उसके मुँह में।
“हिला… खुद हिला माँ… अपनी गाँड से मेरे लंड को मेल…” माँ रो-रोकर हिलने लगीं। उनके मुँह से बस यही निकल रहा था, “दर्द… बहुत दर्द… मत कर इतना… मैं तेरी माँ हूँ… रहम कर… आआआह्ह… निकाल अंदर मत…”
रोहन ने उन्हें नीचे लिटाया, टाँगें बिल्कुल फैला दीं, और अब बिल्कुल पागल की तरह चोदा – कभी चूत, कभी गाँड, कभी दोनों छेदों में एक-एक करके। बीच-बीच में लंड निकालकर माँ के मुँह में थूक के साथ घुसाता, फिर वापस नीचे।
रात के चार बजे रोहन ने पहली बार झड़ने का इरादा किया। उसने माँ को घुटनों के बल किया, मुँह नीचे, गाँड ऊपर, और गाँड के छेद में इतनी तेजी से चोदा कि माँ की आवाज़ भी नहीं निकल रही थी। फिर एक लंबा कराह निकालते हुए पूरा गाढ़ा, गरम वीर्य उनकी गाँड के अंदर उड़ा दिया। इतना ज्यादा कि बाहर निकलकर उनकी चूत पर, जाँघों पर बहने लगा। माँ काँप उठीं। “हाये… अंदर… बहुत गरम… निकल रहा है…”
लेकिन रोहन का लंड सॉफ्ट नहीं हुआ। पाँच मिनट में फिर खड़ा। अब उसने माँ को सीधा लिटाया, उनकी चूत में पूरा लंड घुसाया और दूसरी बार उनकी सूजी हुई चूत के अंदर ही झड़ दिया – इतने जोर से कि माँ के पेट तक महसूस हुआ। वीर्य बाहर निकलकर बिस्तर पर गीला कर रहा था।
अब माँ बिल्कुल बेहाल थीं। बॉडी पर पसीना, थूक, वीर्य सब मिला हुआ। आँखें लाल, साँसें फूली हुई। रोहन फिर भी नहीं रुका। उसने माँ के मुँह को खोलकर बाकी बचा हुआ लंड उनके गले तक घुसाया और तीसरी बार उनके मुँह में ही झड़ दिया। माँ निगल नहीं पाईं, वीर्य उनके मुँह से, नाक से निकलकर चूचों पर गिरने लगा।
सुबह के पाँच-तीस हो चुके थे। रोहन ने माँ को अपनी बाँहों में लिया। उनका पूरा बॉडी उसके वीर्य से लथपथ था – चूत से, गाँड से, मुँह से, चूचों से… सब जगह उसका माल भरा हुआ था, बह रहा था। माँ की आवाज़ बिल्कुल टूट चुकी थी। वह बस धीरे से करवटते हुए बोलीं,
“बेटा… बस… अब और नहीं… बहुत दर्द हो रहा है… चूत भी, गाँड भी… तेरे पापा ने जाने से पहले जो किया था उससे भी ज्यादा कर दिया तूने… मैं नहीं हिल पाऊँगी… प्लीज… सो जा… कल तुझे ट्रेन पकड़नी है…”
रोहन ने उनके माथे पर किस किया, फिर उनकी गाँड में अपना अभी भी हार्ड लंड दबाए हुए कहा, “माँ… मैं जा रहा हूँ दिल्ली… लेकिन जब भी गाँव आऊँगा… यह चूत और यह गाँड सिर्फ मेरी होगी। पापा को कभी मत देना इतनी। समझी?” माँ ने बस आँखें बंद करके धीरे से “हम्म…” किया। उनके अंदर अब भी उसका गरम वीर्य मोनो कर रहा था।
रोहन ने उन्हें टाइटली पकड़ लिया। बाहर पंछी ने कह दिया था, लेकिन कमरे के अंदर अब भी थप-थप की आवाज़ नहीं, बस दो हाँफते हुए जिस्म थे – एक बीस साल का बेटा जिसका लंड अब भी माँ की नरम गाँड के बीच दबा था, और एक चालीस साल की माँ जिसकी चूत, गाँड और मुँह तीनों उसके बेटे के वीर्य से भर चुके थे।
आखिरी रात यहीं खत्म हुई। रोहन ने माँ को इतना चोदा था कि अगले दिन वह ट्रेन में बैठते वक्त भी उनकी चाल से पता चल रहा था कि पिछली रात क्या हुआ है। माँ ने पल्लू से मुँह ढक लिया था, मगर उनकी आँखों में अब भी वह गीला, मजबूर-सा नशा बाकी था।
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